सुनील दुवे
जब हिंदू कृष्ण को नचाना छोड़ कृष्ण के गीतोपदेश का मंचन करेगा तब हम सही दिशा में बढ़ेंगे
पायल शर्मा
श्रीकृष्ण कहते हैं—
अहंकार जीत की तरह लगता है,
पर असल में वही हार की शुरुआत है।
जो विनम्र रहता है, वह बिना लड़े भी विजय पा लेता है।
राजू मिश्रा
बिहार में यदि एनडीए को पूर्ण बहुमत मिलता है, तो नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनने से कोई भी नहीं रोक सकता.
मैंने सारा गुना गणित लगाकर देख लिया है कि ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं बन रही है, जिसमें भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री न बनाए.
इसलिए भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी या उनकी पार्टी को तोड़ देगी - इत्यादि बातें सिर्फ अफवाहें हैं, जिनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है और जो लोकतंत्र को कमजोर करने वाली कुछ ऐसी ताकतों द्वारा फैलाई जा रही हैं, जो किसी भी चुनाव में जनता को गुमराह करने का ठेका लेकर खूब पैसा बनाती हैं.
मैं चाहता हूं कि राजनीति स्वस्थ होनी चाहिए. इसमें झूठ और अफवाहों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. झूठ बोलना, अफवाह फैलाना जनता से धोखा है और यह हमारे लोकतंत्र को कमज़ोर करेगा.
इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव मुझे कई लिहाज से अच्छा लग रहा है, क्योंकि इस बार ज्यादातर राजनीतिक दल राज्य के मुख्य मुद्दों पर ही फोकस कर रहे हैं.
इसलिए सभी राजनीतिक दलों से मेरी अपील है कि आप लोग जनता के मुद्दों पर ही रहें, और स्वस्थ तरीके से चुनाव लड़कर जीतें. मेरी पूरी शुभकामनाएं. धन्यवाद.
सुरजा एस
दो लोग जबरदस्ती
व्हीलचेयर पर लदे हैं
दीदी हार के डर से और मुख्तार मार के डर से
स्वामी शिवाश्रम
पिता करे पुत्र भुगते
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मैं राजनैतिक विषय पर टिप्पणी तो करना नहीं चाहता हूँ, तथापि कभी कभी लोगों के एक ही विषय पर बारंबार लिखना मेरे कुछ बोलने को बाध्य करता है, इसी कारण यह लिख रहा हूँ —
आज प्रत्येक सवर्ण आरक्षण को लेकर परेशान है क्यों ? यह आरक्षण का नाग किसने और क्यों पाला ? इस पर कोई कह सकता है कि कांग्रेस ने सत्ता के लिए पाला । तब मेरा प्रश्न होगा कि कांग्रेस ने क्यों पाला वह तो एक समूह है और उस समूह में आजादी के बाद जब संविधान पारित हुआ तब ७०% से अधिक सवर्ण कहे जाने वाले लोग थे और उन सवर्णों में भी सबसे अधिक संख्या संभवतः ब्राह्मणों की थी ।
उस समय यदि संसद में सवर्णों ने भविष्य को देखा होता कि यह उनकी अपनी ही सन्तानों की बेरोजगारी, भुखमरी और आत्महत्या का कारण बनेगी तो यह स्थिति बिल्कुल न होती । यदि सांसदों ने इसका विरोध किया होता तो न तो नेहरू कुछ कर पाते और न ही शेष ३०% सांसद कुछ कर पाते । यदि आरक्षण जातिगत के स्थान पर मात्र आर्थिक आधार पर होता तो आज किसी को भी आत्महत्या न करनी पड़ती और आरक्षण जिन्हें दिया गया है वे लोग ही उस समय की परिस्थिति के अनुसार सर्वाधिक लाभान्वित भी होते । किन्तु सत्ता की भूख चाहे जो करे । आज भी आरक्षण का समर्थन अधिकांश सवर्ण ही कर रहे हैं, जो विपक्ष में बैठे हैं, इनकी संख्या आज भी अधिक है ।
अब जो पुरखों ने किया वह तो भुगतना ही पड़ेगा, फिर रोना क्यों ? अदालतें भला किसी सरकार के विरुद्ध कैसे जा सकती हैं ? भला कोई भी सरकार आरक्षण को समाप्त करने की सोच भी कैसे सकती है ? क्योंकि यह सोचते ही सत्ता चली जायेगी । और यदि बिल पास भी हो जाये तो लागू नहीं हो सकता है, सुप्रीम कोर्ट बाधा करेगा और यदि वहां से भी पास हो जाये तो खून खराबा,देश बँटवारा तक स्थिति बन जायेगी आरक्षण उसके बाद भी समाप्त होने वाला नहीं है अतः रोना क्यों ? इसी को कहते हैं जैसी करनी वैसी भरनी । पिता करे पुत्र भुगते । ओ३म् !
स्वामी शिवाश्रम